( सन्दर्भ बताना ज़रूरी तो नहीं पर प्रबुद्ध पाठक समझ ही जायेंगे... इस बार पढ़िए बोधिसत्व की कविता )
मधुरी बानी बोल
देस समूचा आज सेठों के हाथ में है...
जो बचा है वो जेब में है काँख में है
संस्कृति...
Written by अशोक कुमार पाण्डेय
on असुविधा
1 day 3 hours ago